फ्रांस में कर्ज का संकट पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बना
फ्रांस के सरकारी बॉन्ड की बड़े पैमाने पर हो रही बिकवाली दुनिया भर की सरकारों के लिए चिंता का संकेत बन गई है। कैपिटल इकोनॉमिक्स के विश्लेषकों का कहना है कि निवेशक अब लगातार बने रहने वाले बजट घाटे को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हैं। पेरिस जैसी स्थिति से बचने के लिए अब दुनिया भर के नीति-निर्माताओं को सरकारी खर्च में तत्काल कटौती करनी होगी।
फ्रांस की समस्या उसके कर्ज का भयावह स्तर नहीं है, जिसके 2026 में GDP के 118% तक पहुंचने का अनुमान है। यह अनुपात ब्रिटेन के लगभग बराबर है और अमेरिका या जापान के मुकाबले भी कम है। असली समस्या देश की जरूरत से ज्यादा खर्च करने की प्रवृत्ति है। जहां इटली को 1% के प्राथमिक बजट अधिशेष (Primary Surplus) की उम्मीद है और ब्रिटेन अपने बजट घाटे को लगभग 1.4% पर बनाए हुए है, वहीं फ्रांस का यह आंकड़ा बढ़कर 2.8% हो गया है। किसी भी अन्य बड़ी अर्थव्यवस्था में मौजूदा सरकारी खर्च और कर्ज को स्थिर करने के लिए जरूरी खर्च के बीच इतना बड़ा अंतर नहीं है।
राजनीतिक परिस्थितियां बजट को सुधारने की कोशिशों में बाधा बन रही हैं। इमैनुएल मैक्रों की सरकार के पास संसद में बहुमत नहीं है और खर्च में कटौती की हर कोशिश फ्रांस के नागरिकों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर देती है। निवेशकों को खुले तौर पर लोकलुभावन राजनीति (Populism) के बढ़ने का डर है, खासकर इसलिए क्योंकि मरीन ले पेन अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की प्रमुख दावेदार हैं। इसलिए विशेषज्ञों को जरूरी सुधारों की संभावना कम नजर आती है और उनका अनुमान है कि कुल बजट घाटा 5.4% के चिंताजनक स्तर पर बना रहेगा।
पेरिस की समस्याओं की कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ सकती है। विदेशी निवेशकों के पास फ्रांस के बाजार में उपलब्ध सरकारी कर्ज का 60% हिस्सा है, जिसकी कुल कीमत लगभग 1.6 ट्रिलियन यूरो है। इन बॉन्ड की कीमतों में तेज गिरावट से वैश्विक बैंकों और निवेश फंडों की पूंजी को नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि, राहत की एकमात्र बात यह है कि इससे वैश्विक वित्तीय संकट पैदा होने की संभावना कम है, क्योंकि फ्रांस का जोखिम भरा सरकारी कर्ज अंतरराष्ट्रीय निवेश पोर्टफोलियो में अपेक्षाकृत समान रूप से फैला हुआ है।